तंत्र के सबसे बड़े गढ़ और इसकी देवी मां कामाख्या देवी मन्दिर के बारे में सबसे जरूरी रिपोर्ट 🙏
14/अगस्त 🙏जो लोग इस मंदिर में गए हैं। उन्हें पता होगा मां यहां जल रूप में विराजमान हैं। उनकी बाकी की 9 महाविद्या भी इसी रूप मे हैं। जल स्पर्श ही मां का दर्शन है। जो लोग नहीं गए, मैं उन्हें इस जल स्पर्श दर्शन के बारे में अपने अनुभव के साथ समझाने का प्रयास करती हूं। 🙏जल स्पर्श दर्शन के लिए करीब 10 फीट गहरी गुफा में प्रवेश…करीब 40-50 सीढ़ियां चढ़ने के बाद सामने मां कामाख्या के मंदिर का मुख्य द्वार था। लगा अब देवी के दर्शन होंगे। पंडित ने आगाह किया- संभलकर पैर रखिएगा, सीढ़ियां फिसलन भरी हैं और रोशनी के नाम पर बस मां की एक ज्योति है। समझ नहीं आया कौन सी गुफा, कौन सी ज्योति और कौन सी सीढ़ियां? क्योंकि वहां अब तक तो काफी रोशनी थी। सीढ़ियां कहीं दिख नहीं रहीं थी, तभी पंडित ने कहा, पीछे आइये। हम कुछ कदम आगे चले कि एक संकरे रास्ते में घुस गए। अब वहां घुप अंधेरा था। पैर अचानक पत्थर से बनी पहली सीढ़ी पर पड़ा। सीढ़ी इतनी पतली और फिसलन भरी थीं कि पैर किसी तरह टिक रहा था। और फिर 10-11 सीढ़ियां उतरने के बाद हम एक गुफा के भीतर थे। उजाले के लिए बस एक दीपक की रोशनी भर। 🙏पंडित ने कहा, दर्शन कीजिए। मैंने सामने रखी धातु की मूर्ति देखी। पर फिर उसने थोड़ा चिल्लाया। घुटनों के बल बैठ जाइये, हाथ सामने गहरे स्थान के नीचे ले जाइये। फिर चिल्लाकर पूछा-जल स्पर्श हुआ, हुआ? और नीचे डालिए, थोड़ा और नीचे। मेरे हाथ में जल का स्पर्श हुआ। 🙏मैंने कहा, हां जल मिल गया। इसे माथे पर लगाइये। दर्शन हो गए। बस यही जल स्पर्श दर्शन के वजूद पर मंडराते खतरे से मां कामाख्या के साधक आशंकित हैं। करीब ढाई साल पहले इसी प्राकृतिक जल धारा या पेटिशनर्स की भाषा में कहें तो प्रत्यक्ष कामाख्या मां और उनकी 9 महाविद्याओं के वजूद पर खतरे की आशंका को लेकर सरकार के साथ एक कानूनी लड़ाई शुरू हुई। ❓अब जरा ये समझना जरूरी है कि इस प्राकृतिक धारा पर खतरा क्यों? ❓यहां कामाख्या एक्सेस कॉरिडोर बन रहा है। लेकिन इस कॉरिडोर की घोषणा से पहले न तो कोई रिसर्च हुई और न कोई सर्वे। पहाड़ पर 10 महाविद्याओं के रूप में बह रही जल धारा का स्तर जाने बिना किसी तरह की खुदाई, कस्ट्रक्शन या फिर ब्लास्टिंग जल प्रवाह को डिस्टर्ब कर सकती है। धारा सूख सकती है या धारा अपना रूट बदल सकती है। पेटशिनर साधक जब कोर्ट गए तो तब जाकर एक सर्वे हुआ। जल धारा का स्तर जानने के लिए हुए हाइड्रोलोजिकल सर्वे कराने के लिए इसंटीट्यूट चुनने में सरकार कितनी गंभीर थी, इससे से ही समझिए कि सबसे पहले सरकरा ने वाटर हार्वेस्टिंग की कंपनी को ठेका दिया। साधकों ने कोर्ट को सरकार के इस ब्लंडर के लिए इन्फार्म किया तो सरकार ने फिर एक हैदराबाद की कंपनी चुनी। वो कंपनी ठीक थी लेकिन सरकार की जल्दबाजी से कदम नहीं मिला पाई। सरकार 7-8 महीनों में रिपोर्ट चाहती थी पर इस कंपनी ने 20 महीने का वक्त मांगा। सरकार ने खुद कंपनी बदल दी। अब फिर एक कंपनी चुनी गई। ये कंपनी ठीक कंपनी है। सरकार के दिए वक्त पर रिपोर्ट भी ले आई। लेकिन अब ये रिपोर्ट या तो सरकार ने पढ़ी या इस कॉरिडोर को बनाने का ठेका जिस कंपनी (एलएनटी) ने पढ़ी या फिर खुद इस इंस्टीट्यूट ने पढ़ी जिसने सर्वे किया। अब पेटिशनर कह रहे हैं कि हमें रिपोर्ट दिखा दो, सबकुछ ठीक है तो काम शुरू करो। लेकिन सरकार ने कहा…नहीं रिपोर्ट तो नहीं मिलेगी। अगर इस कहानी को लाइन बा लाइन पढ़ेंगे तो पता चलेगा कि सरकार किस तरह देश के इस महत्वपूर्ण मंदिर और उसमें विराजमान मां कामाख्या के अस्तित्व से खिलावड़ कर रही है।
पोस्ट कॉपी दैनिक भास्कर।







